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भारत की चीन को दो टूक – दोक़लाम से पीछे नहीं हट सकता भारत। सरकार ने भेजी और सेना

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चीन के साथ भूटान के क्षेत्र डोकलाम पर चल रहे विवाद में भारत पीछे नहीं हट सकता। गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में विदेश सचिव एस जयशंकर ने इसके सामरिक और रणनीतिक महत्व को बताते हुए स्थिति स्पष्ट कर दी है।विदेश मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि भारत अपने इस रूख पर कायम है और डोकलाम से पीछे नहीं हटा जा सकता। वहीं रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जरूरत पड़ी तो डोकलाम में भारत और सेना भेजने के लिए तैयार है। ऐसे में भारत और चीन के बीच दोकलम पर चल रही तनातनी के कुछ दिन चलने के आसार हैं।

चीन द्वारा कश्मीर में तीसरे देश के हस्तक्षेप की धमकी पर मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि इस पर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं है। पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर का भी कहना है कि चीन से कुछ भी बोल देने वाली प्रतिक्रिया आ रही है। ऐसा लग रहा है जैसे उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा है और बदहवासी में कोई भी बयान दे दे रहे हैं।

क्यूँ पीछे नहीं हट सकता भारत जब तक चीन के सैनिक सड़क निर्माण से पीछे नहीं हटते, भारतीय सैनिक नॉन काम्बैट मोड में डोकलाम में डटे रहेंगे। समझा जा रहा है कि इस दौरान कूटनीतिक प्रयासों के जरिए विवाद के निबटारे तक यथा स्थिति बहाल रखने की शर्त को प्रमुखता दी जाएगी। बीच के रास्ते के तौर पर भूटान चीन और भारत दोनों से अपनी-अपनी सेनाओं को अपने क्षेत्र में ले जाने के लिए कह सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि ब्रिक्स देशों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए जा रहे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की अपने चीनी समकक्ष से चर्चा के बाद इसका हल निकल सकता है।

कहां है भारत दोकलम भूटान का भूभाग है। भारत ने भूटान को उसके सीमाक्षेत्र की सुरक्षा की गारंटी दे रखी है। मौजूदा समय में भारतीय सेना भूटान के क्षेत्र में दोकलम में जमी हुई है। यह सीमा चीन से लगती है और चीन इसे अपना हिस्सा बताता है। जबकि भूटान का दावा है कि यह क्षेत्र उसका अपना है। इसको लेकर दोनों देशों में विवाद सुलझने तक यथास्थिति बनाए रखने के लिए 1988 और 1998 में दो बार सोझौता भी हुआ है। इस विवाद को सुलझाने के लिए चीन और भूटान में वार्ता चल रही थी। इस दौरान चीन के सैनिकों ने पिछले साल की तरह इस बार दोकलम में सड़क निर्माण का कार्य शुरू कर दिया।

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वे अचानक साजो-सामान लेकर आए और सड़क मार्ग बनाने में जुट गए। भूटान के सैनिकों ने इसका प्रतिरोध किया, लेकिन सफल नहीं हो पाए। तब उन्होंने भारतीय सेना को इसकू सूचना दी और सेना ने चीन के सैनिकों को निर्माण कार्य करने से रोक दिया है। जून के महीने से ही भारतीय सैनिकों अस्थाई तंबू गाड़कर दोकलम क्षेत्र में डटे हुए हैं।
चीन की विस्तारवादी नीति है। इसी इरादे से चीन ने जहां दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप का निर्माण करके इस पर अपना दावा तेज कर दिया है, वहीं फिलिपींस के करीब में स्थित स्पार्टले द्वीप को भी अपना बता रहा है। भारत के अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताने से नहीं चूकता और तवांग तक दावा करता है।

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हाल में सिक्कम तक उसने अपने दावे को धार दे दी थी। इस तरह से चीन अपनी ताकत का एहसास करके पड़ोसी देशों के भू-भाग पर अपनी निगाह गड़ाए है। कभी उसने इसी तरह की नीति पर चलते हुए तिब्बत पर कब्जा कर लिया था और आज तिब्बत चीन का स्वयत्तशासी क्षेत्र बनकर रह गया है।

विस्तारवादी नीति के तहत ही चीन लद्दाख क्षेत्र में और अक्साईचिन में भी अपने नजरें गड़ाए रखी है। इसके अलावा चीन की मंशा दुनिया के देशों से सड़क, जल, हवाई से जुड़कर अपना आर्थिक दायरा बढ़ाने की है। इसी मंशा से वह वन बेल्ट वन रोड योजना पर काम कर रहा है।
पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से बीजिंग , न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज, चीन-मंगोलिया-रूस, चीन से सेन्ट्रल एशिया-वेस्टर्न एशिया, बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार रूट जैसी परिकल्पना पर काम कर रहा है। ल्हासा से नेपाल तक अब चीन की आवाजाही सुगम हो चुकी है।

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