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2012-2017:सेना के हौसले में बड़ा बदलाव आया है,कुछ साल पहले हाथ खड़े कर दिए थे सेना ने और आज घुसी चीन में 

देश

जो मूर्ख मिलिट्री विषयो में मोदी की आलोचना करते है या किसी घटना के बाद बरसाती मेढक की तरह उछल – उछल के टर्राने लगते है की ये क्यों नहीं किया वो क्यों नहीं किया .कहाँ गया 56 इंच का सीना तथा वे राष्ट्रवादी जो वीर रस की कविताएं अथवा तोगडिया के चर्राते हुए भाषण सुन कर सीना फुलाए काय काय करने लगते है उनको सिर्फ एक छोटी सी बिनम्र सलाह जिस विषय की जानकारी न हो या जिस विषय के तुलनात्मक डाटा पास न हो उस पर पहले अपना होमवर्क पूरा करे .वरना ऐसा राष्ट्रवाद एक चूतियापे से जादा कुछ नहीं है अब एक बात और मिलिट्री साज सामान की खरीद तथा उत्पाद कौन सा लिया जाए , ऐसे उत्पादों की विश्वव्यापी खोज फिर उसका आकलन .

खरीद से पहले के परीक्षण , सेना वायु सेना तथा थल सेना से उसकी जरूरतों के अनुसार स्वीकृति फिर मोलभाव तथा आर्डर देने की एक दुरुह तथा जटिल प्रक्रिया होती है .फिर संवंधित उत्पाद के उत्पादक देशो में आपसी गलाकाट तथा सभी उचित अनुचित उपाय अपना कर टेंडर हासिल करने के बाहरी प्रयासों पर सटीक निगाह रखते हुए .खरीद पर अंतिम फैसला लेना और आर्डर के बारे में अपनी जरुरत की अवधि के अन्दर मिलिट्री साज समान की आपूर्ति का आश्वासन लेना और फिर सम्बंधित उत्पाद की आपूर्ति मिलना

इसमें पर्याप्त समय लगता है ये विषय दीपावली के समय आतिशवाजी खरीदने जैसे सरल नहीं होतेकोई भी युद्ध या सीमित मिलिट्री कनफ्लिक्ट बाल्टी भर भर बकर बकर करने से नहीं जीते जाते न ही वीर रस के कवियों की कविताओं से न ही सिर्फ जिस्म की फड़कन से युद्ध जीतने के लिए जोश उत्साह उमंग और हिम्मत के साथ साथ आधुनिक हथियारों , अन्य साज सामान ( जिसकी लिस्ट के बारे में बड़े बड़े बुद्धिजीवी भी सपने में नहीं सोच सकते ,

सिवाय मिलिट्री एक्सपर्ट के …) की भी जरुरत होती है तथा आम जनता के प्रचंड सहयोग तथा वलिदान की भी जरुरत अब रहा एक समाचार मनमोहन सिंह की सरकार के समय का ..ये हालत वर्ष 2014 तक जारी रहे है पिछले तीन सालो में इस छेत्र में क्या क्या घटित हुआ उसकी जानकारी भी साथ में सज्ञान में रखें !!!

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