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क्या केजरीवाल घोटाला भारत का सब से बड़ा घोटाला है? पढ़े इनसाइड स्टोरी .!

केजरीवाल दिल्ली देश

साल 2011 में कांग्रेस के भ्रष्टाचारों के खिलाफ एक लहर उठी. अन्ना नाम का एक समाज सेवक आन्दोलन पर बैठ गया. एंटी करप्शन नाम का एक आन्दोलन शुरू हुआ और कई अलग अलग चेहरे दुनिया के सामने उभरे. उन चेहरों में से एक चेहरा था अरविन्द केजरीवाल का, एक ऐसा चेहरा जो शुरू से ही खुद को ईमानदार बता रहा था. लेकिन एक सवाल उठता है की 5 साल पहले यानी कि साल 2011 के पहले अरविन्द केजरीवाल कौन था, क्या करता था. इस बात का जवाब हम देंगे आपको।

भारत की खुफिया एजेंसी रॉ यानी कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के पूर्व इंटेलिजेंस ऑफिसर आरएसएन सिंह ने अरविन्द केजरीवाल से जुड़े कई तथ्यों को उजागर किया है और सबूत दिये हैं जिससे साबित होता है अरविन्द केजरीवाल शुरू से ही एक भ्रष्ट आदमी था. इन सबूतों से साबित होता है कि केवल अन्ना आन्दोलन ही आम आदमी पार्टी के फण्ड का कारण नहीं था.
एक पार्टी बनाने के लिये चुनाव लड़ने के लिये और चुनाव जीतने के लिये जितने पैसे की जरूरत है उतने पैसे केवल अन्ना आन्दोलन के दम पर जुटा पाना बहुत मुश्किल है. हम बताते हैं अरविन्द केजरीवाल ने किस तरह से सबकुछ मैनेज किया, ये ग्राफ देखिये

1.CIA यानी कि सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी पूरी दुनिया की ज्युडीशिअरी को कण्ट्रोल करती है, वो चाहे किसी भी देश की क्यों ना हो, और इस एजेंसी को दुनिया भर से तमाम बड़े बड़े अरबपति फण्ड करते हैं, वो ऐसे इसलिये करते हैं ताकि व्यापार, मीडिया, राजनीति से लेकर हर क्षेत्र को अपने हिसाब से नियंत्रित कर सके, उनका उद्देश्य खास तौर से राष्ट्रों को कमजोर करके उनपर अपना नियंत्रण बनाना होता है. यहाँ तक कि अमेरिका का राष्ट्रपति भी इस एजेंसी के प्रभाव के बिना नहीं बनता.
इन्हीं सब वजहों के चलते अमेरिका पूरी दुनिया का बाप बना फिरता है और जो फोर्ड और रॉकफेलर फाउंडेशन के करीब है उनपर अमेरिका की दयादृष्टि बनी रहती है. यही वजह है कि ऐसे लोग राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बात नहीं करते.
प्रतिष्ठित मग्सेसे पुरस्कार भी केवल कुछ ही ऐसे लोगों को मिलता है जिन्होंने वास्तव में जमीनी स्तर पर काम किया है और जिनके काम के बारे में पूरी दुनिया जानती है, यह अवार्ड भी जो कि फोर्ड फाउंडेशन की तरफ से दिया जाता है, जिन लोगों को ये अवार्ड मिलता है उनमें ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जिनके बारे में कोई नहीं जानता.
नीचे दिये गये दस्तावेज को देखिये, ये फोर्ड और रॉकफेलर फाउंडेशन जुदा दस्तावेज है जिसमें सीआईए के एक बेहद पुराने और सबसे लम्बे समय तक सीआईए के साथ काम करने वाले एजेंट और सीआईए के डायरेक्टर के सिग्नेचर हैं, कुछ देशों के तथाकथित बुद्धिजीवी, लेखक और प्रोफेसर इन संस्थाओं की वित्तीय मदद से प्रभावित होते हैं, और आप ऊपर दिये गये ग्राफ में साफ़ साफ़ देख सकते हैं कि यही फाउंडेशन अरविन्द केजरीवाल की संस्था और उसके जैसे कई तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी फण्ड करता रहा है.

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साल 2005 में अरविन्द केजरीवाल की संस्था जन सुविधा को वर्ल्ड बैंक से बहुत बड़ा फण्ड मिला था और वो संस्था रजिस्टर्ड भी नहीं थी. सरकार ने संस्था के खिलाफ अपराधिक मुकदमा दर्ज कराया था. 2006 में अरविन्द केजरीवाल ने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और उसी साल उन्हें मैग्सेसे अवार्ड मिला था. फण्ड मिलने के कुछ ही दिन बाद केजरीवाल का नाम अवार्ड के लिये नोमिनेट किया गया था. केजरीवाल ने अपनी नौकरी इस लियें छोड़ी क्योंकि उन्हें बड़ी मात्रा में फण्ड मिलने लगा था. पहली ही बार में उन्हें 80 हजार अमेरिकी डॉलर का फण्ड मिला था, जो कि उनकी 15 साल की सैलरी के बराबर था. उसके तुरंत बाद ही केजरीवाल ने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था.
फिर केजरीवाल ने अपनी पुरानी संस्था बंद करके नई संस्था बनाई, जिसका नाम था कबीर और यह संस्था भी पिछली संस्था की तरह ही अवैध थी. एक रिपोर्ट के मुताबिक कबीर नाम की संस्था ने 15 अगस्त 2005 को काम काज करना शुरू किया और उसी दिन संस्था को फोर्ड फाउंडेशन की तरफ से 43,48,036 रूपये का फण्ड मिला, लेकिन फोर्ड फाउंडेशन ने संस्था को वास्तव में 87 लाख रूपये का फण्ड दिया था. रेपोर्ट के मुताबिक केजरीवाल को संस्था बनाने से पहले भी फोर्ड फाउंडेशन से पैसे मिलते रहे.

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लेकिन अरविन्द केजरीवाल ने FCRA में जो जानकारी दी उसके मुताबिक उनकी संस्था को 2005 से 2011 तक मात्र 75,54,006 रूपये का डोनेशन मिला. असल में ये जानकारी और तथ्य भी पूरी तरह से गलत थे, फिर केजरीवाल ने कबीर की वेबसाइट से विदेशी फंडिंग की पूरी जानकारी हटा दी और 2007 से 2010 के बीच कबीर को मिली विदेशी फंडिंग का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं है.
केजरीवाल को मिली फंडिंग की पूरी जानकारी तब साफ़ हुई जब फोर्ड फाउंडेशन ने अपना पूरा ब्यौरा पेश किया, उसकी फंडिंग लिस्ट में केजरीवाल की संस्था का नाम भी था, और डोनेट की गई रकम का पूरा ब्यौरा भी.
केजरीवाल को अशोका नाम की एक संस्था से भी बड़ी मात्रा में फंडिंग मिली, यह संस्था भारत की नहीं थी, अशोका एक अमेरिकी संस्था है जो कि शीत युद्ध के दौरान बनाई गई थी.
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केजरीवाल को मग्सेसे के लिये नामित भी फोर्ड फाउंडेशन के एक प्रतिनिधि स्टीवेन सोल्निक ने किया था, एक आरटीआई के माध्यम से पता चला कि NGO की फंडिंग में बड़ी अनियमितता मिली है. फोर्ड फाउंडेशन के अलावा अरविन्द केजरीवाल की संस्था को डच एम्बेसी, इंडियन फ्रेंड्स एसोसिएशन और यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम से भी बड़ी मात्रा में फण्ड मिले हैं.
डच एम्बेसी वही संस्थान है जिसने गुजरात दंगों के लिए तीस्ता सीतलवाड को फण्ड किया था और कांग्रेस को भी फण्ड किया था ताकी 2002 में गुजरात में नरेन्द्र मोदी विरोधी अभियान को बल मिल सके.
एक और संस्था पनोस है, जो कि दक्षिण एशिया में मीडिया को कण्ट्रोल करने वाली दूसरी सबसे बड़ी संस्था है जो तमाम मीडिया संगठनों को फण्ड कर रही है, इसका उद्देश केवल मीडिया को फण्ड करते हुये राष्ट्र द्रोही ताकतों को मदद पहुँचाना है.
केजरीवाल मेहनत करके और अपने दम पर यहाँ तक नहीं पहुंचा है, जबकि उसे सीआईए ने बनाया है, ताकि भारत में राष्ट्रविरोधी ताकतों का बढ़ावा दिया जा सके. जिससे भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर हो और विकास की गति में बाधा आये.
सीआईए केवल केजरीवाल को ही फण्ड नहीं करता जबकि इनके जैसे सैकड़ों लोग हैं जिन्हें सीआईए से फंडिंग मिलती है ताकि विकासशील राष्ट्रों की विकास की गति को रोका जा सके और उनपर अपने हिसाब से प्रभाव डाला जा सके.
source: newstrend.news

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