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Breaking:ब्राह्मण होने के बावजूद दफ़नाए जाने की राजनीतिक मंशा का ख़ुलासा।एकलौति सगी रिश्तेदार को धक्के देकर निकाला जिससे चुनौती ना बन जाए।

जयललिता देश पॉलिटिक्स

नई दिल्ली : तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता को पूरे राजकीय सम्मान के साथ मंगलवार को मरीना बीच के पास एमजीआर मेमोरियल में दफनाया दिया गया। जयललिता ब्राह्मण थीं ऐसे में दाह संस्कार की जगह उन्हें दफनाए जाने को लेकर लोगों में जानने की उत्सुकता है।

जयललिता आस्था रखने वाली महिला थीं और वह नियमित रूप से अपने माथे पर आयंगर नमम लगाती थीं तो ऐसे में राज्य सरकार और शशिकला के परिवार ने आयंगर प्रथा का पालन करने की बजाय उन्हें दफनाने का फैसला क्यों किया? जबकि आयंगरों में दाह-प्रथा प्रचलित है।

तमिलनाडु के नेताओं के अंतिम संस्कार के साक्षी रहे एक वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षक ने कहा कि जयललिता को दफनाए जाने के पीछे एक से अधिक कारण हो सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘चूंकि, जयललिता आस्था रखने वाली महिला थीं, ऐसे में लोग उम्मीद करते थे कि उनकी मौत के बाद उन्हें जलाया जाए लेकिन ऐसा करने के लिए जयललिता के परिवार के किसी सदस्य की जरूरत पड़ती। जयललिता की एक ही सगी रिश्तेदार दीपा जयकुमार है। दीपा जयललिता के दिवंगत भाई जयाकुमार की बेटी है। स्पष्ट है कि शशिकला का परिवार नहीं चाहता होगा कि दीपा अंतिम संस्कार में शामिल हो और उन्हें किसी तरह की चुनौती पेश करे।’
गौरतलब है कि दीपा जो कि ब्रिटेन में मीडिया एवं संचार में रिसर्च कर रही है, उसने 22 सितंबर के बाद अपोलो अस्पताल में जयललिता से कई बार मिलने की कोशिश की लेकिन उसे मिलने की इजाजत नहीं दी गई। दो दिन पहले पुलिस को दीपा और उसके पति को अस्पताल से जबरन बाहर करते देखा गया। दोनों को अस्पताल और मीडिया से दूर रखने के निर्देश वरिष्‍ठ नेताओं की तरफ से आए थे।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जयललिता के अंतिम संस्कार कार्यक्रम से जुड़े सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ऐसा करने के पीछे वजह बताई।

अधिकारी ने कहा, ‘वह हमारे लिए आयंगर नहीं थीं। वह किसी जाति एवं धार्मिक पहचान से परे हो गई थीं। यहां तक कि पेरियार, अन्ना दुरई और एमजीआर सहित ज्यादातर द्रविड़ नेता दफनाए गए। नेताओं के दाह-संस्कार करने की हमारे पास कोई मिसाल नहीं है। इसलिए हम शवों को चंदन और गुलाब जल के साथ दफनाते हैं।’
नेताओं के स्मारक बनाए जाने से उनके समर्थकों एवं प्रशंसकों को अपने नेताओं को याद रखने में मदद मिलती है। द्रविड़ आंदोलन से जुड़े नेता नास्तिक रहे हैं। द्रविड़ नेता सिद्धांत रूप से ईश्वर और उनसे जुड़े प्रतीकों को नकारते रहे हैं। लेकिन यह देखना दिलचस्प है कि द्रविड़ों में भी ईश्वर में अविश्वास की जगह प्रतिमाओं एवं स्मारकों ने ले ली है। प्रशंसक और अनुयायी मानते हैं कि वे अब भी मरीना बीच पर एमजीआर की घड़ी की टिक-टिक की आवाज सुन सकते हैं।

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