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चलिए आज आपको मिलवाते है असली वाले “सुल्तान ” से… हालात जानकर रो पड़ोगे

दिल्ली देश
चलिए आज आपको मिलवाते है असली वाले “सुल्तान ” से …  
 
आप में से काफी कम लोग ही होंगे जिन्होंने इनके बारे में सुना होगा…..ये फ्रीस्टाइल कुश्ती के खिलाडी है …और मिट्टी पर खेली जाने वाली कुश्ती में भारत मे इनकी टक्कर का कोई पहलवान भी नहीं है |खेलों के काफी नज़दीक रहा हूँ और नेशनल -इंटरनेशनल खिलाडियों से भी मिलता रहता हूँ लेकिन ऐसी शख्सियत से मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात थी |
हम में से अधिकतर लोग अपने जीवन में हो रही समस्यों से जल्द ही हार ये सोच कर मान जाते है की “होनी में यही लिखा होगा ,ये चीज मेरे बस की नहीं है ,मेरी तो किस्मत ही खराब है ,काश ऐसा न हुआ होता ,भगवान ने क्यों मेरे साथ ही ऐसा किया और न जाने क्या क्या कह कर अपने हारे हुए मन को दिलासा देते है और अपने Failures को उचित ठहरा कर रोज़ वही घिसी -पिटी ज़िंदगी जीते है |
आज आपके साथ ऐसे इंसान की कहानी साँझा करने जा रहा हूँ ,जो शायद आपको आपके जीवन में हो रहे उतार-चढ़ाव से लड़ने की और लड़ते ही रहने की प्रेरणा दे |

इस कहानी की पृष्ठभूमि हरियाणा है जहाँ खेलों के नाम पर कुश्ती और कबड्डी ही खेली जाती रही है |हर गांव -देहात में आज भी आपको एक जोहड़,एक मंदिर और एक अखाडा तो जरूर मिलेंगे |
ऐसा ही एक गांव है सासरौली (डिस्ट्रिक्ट झज्जर) जहाँ एक सामान्य से परिवार में दिनाक 1 अप्रैल 1986 जन्मे बेटे को उसके पिता जी (अजीत सिंह जो पेशे से खुद भी एक पहलवान थे) ने पहलवान बनाने का ही सपना संजोया था | बेटा जब 3-4 साल का हुआ तब घरवालों ने बेटे में कुछ असामान्य बदलाव को नोटिस किया | वो अब ना के बराबर बोलता और ऊँचा ही सुनता |.धीरे धीरे उसकी बोलने और सुनने की शक्ति जाती रही | घरवालों पर मानो जैसे बिजली सी टूट पड़ी थी .जितना उनके बस में था उतना उन्होंने किया ..कभी उस डॉक्टर के पास कभी किसी और की पास …कुदरत इस कदर रूठेगी ये न सोचा था |
कठिनाइयां गूंगे -बेहरे बच्चे के जीवन दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी ,पढाई-लिखाई कौन कराता, कैसे कराता.. लेकिन अजीत सिंह जी इतनी जल्दी हार मान ने वालों से नहीं थे (एक सच्चा खिलाडी ही जीवन में जीत-हार के मायने समझता है )
7 साल की उम्र से ही बेटे को अपने साथ अखाडा ले जाना शुरू किया,साथ लगकर कसरत करते |कठिनाइयां दांव-पेंच सिखाने से लेकर कुश्ती की बारीकियां समझाने तक हर जगह आती लेकिन बेटा दिमाग से काफी तेज़ था ,बहुत जल्दी ही चीजों को समझता और सिख लेता |
घर की माली हालत कुछ जय्दा अच्छी नहीं थी (हमे देश की किसान का ये दुर्भाग्य है की वह किसान है ) लेकिन बेटे की खुराक में पिता जी ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी ,पूरे परिवार की हिस्से का दूध अब बेटे को ही मिलता |
पिता जी की मेहनत रंग लाने लगी लड़का सालाना मेले में आयोजित कुश्ती जीत कर आया ,इस पहली जीत पर पिता जी ने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया | उस दिन का दिन था और आज का दिन है ,उस लड़के ने कभी मुड़ कर नहीं देखा, जब कभी भी कुश्ती करने के लिए उतरा जीत कर ही लौटा |






अब बात करते है इनकी खेल उपलब्दियों की
74 किलो ग्राम वेट केटेगरी में खलने वाले इस पहलवान ने कई के नाम कई रिकार्ड्स है, भारत को 2005 मेलबोर्न deaflymics में स्वर्ण पदक जितने वाले एक यही एकमात्र खिलाडी थे |जितने के बाद Prize distribution ceremony में जब तिरंगा ऊपर सबसे ऊपर गया तो आँखों से आंसू छलक पड़े,इनका कहना था की ये उनके जीवन के सबसे यादगार लम्हों में से एक था |
उसके बाद इन्होने Taiwan deaflympics , 2009 में रजक पदक और Bulgaria deaflympics, 2013 में स्वर्ण पदक जीता | जीत का सिलसिला यूँही चलता रहा |सन 2008 में आयोजित World deaf Wrestling championship ,Armenia में रजत पुरस्कार और सन 2012 में आयोजित World deaf Wrestling championship ,Bulgaria में कांस्य पदक जीत |अभी फिर से हाल ही Iran में आयोजित World deaf Wrestling championship,2016 में इन्होने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया है |
खुशियां कम आई ज़िंदगी में लेकिन मुसबितों मुड़ मुड़ कर आती रही , तीन बार का विश्व विजेता और 2 बारी का Deaflymics गोल्ड मेडलिस्ट आज भी तंगहाली में ही जिंदगी बसर कर रहा है | कई सालों की जदोजहद के बाद हरियाणा सरकार ने इन्हे एक क्लर्क की नौकरी दी | साल भर में 5 हजार से लेकर 1 लाख तक होने वाले सभी दंगलों में ये हिस्सा सिर्फ इस लिए लेते है की अपनी खुराक का खर्चा निकल सके |
हमारे देश खेल और खिलाडियों की दुर्दशा तो हम सभी जानते ही है |.इतनी सारी उप्लब्दियां होने के बावजूद भी सरकार ने इनके लिए आजतक कुछ ख़ास नहीं किया है | उसका एक मुख्य कारण यह था की मूक-बधिर या विकलांग (सॉरी मोदी जी दिव्यांग) खिलाडी थोड़ा भेद-भाव का शिकार रहे|.इन्हे जितने के बाद न ही कोई इनाम और न ही कोई ऐसी सरकारी नौकरी दी गई जो की और किसी भी खेल में पदक लाये खिलाडी को मिलती है |
आप भी उनसे जुड़ सकते है उनके पेज Virender Sing-Goonga Pehelwan
ताउम्र गुमनामी की ज़िंदगी जीने वाले ये खिलाडी थोड़े तो मान सम्मान की उम्मीद रखते है ,लेकिन कोई भी मान सम्मान तो दूर की बात मौजूदा भारतीय रेसलिंग फेडरेशन के एक उच्च अधिकारी से एक interview में जब इनका नाम पूछा गया तो जनाब बगलें झाकने लगे |जब इनसे मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया की देश के लिए इतने मैडल जितने के बावजूद इन्हे किसी भी प्रकार की सहयता नहीं मिली है | ये आज भी छत्रसाल स्टेडियम में नए खिलड़ियों के बीच रहते है खाते है सोते है ,वहीँ दूसरी और कई सीनियर्स खिलाडियों को AC कमरा मिला है और विभिन्न प्रकार की सुख सुविधाएं |
इनकी भारत सरकार से दूसरी शिकयत ये रही है ये देश का प्रतिनिधत्व “Able-body” खिलाडियों के साथ ही करना चाहते है ,लेकिन रेफरी की सिटी (whistle) न सुन पाने के कारण इन्हे able बॉडी एथलीट के साथ खलने की इजाजत नहीं मिल पाई है | और इनका कहना ये है की इन्हे अगर एक मौका मिले तो ये अपना ध्यान अपने प्रतिद्वंदी के साथ साथ अंपायर के ऊपर भी रखंगे | इनकी ये लड़ाई अभी फ़िलहाल जारी है |
दुनिया भर में अपनी ताकत का लोहा मनवा चुके इस खिलाडी को आज भी भारत सरकार से एक भी पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया है | हाल फिहाल की हरियाण सरकार की नै राज्य की खेल निति में हुए बदलाव करते हुए Olympics और Paralymics प्रतियोगितों में मैडल विजेताओं को समान (equal) पुरस्कार की घोषणा की है |
इन्होने इसी वजह से 2016 का Rio -paralymics खेलना का मन बना लिया है | इनका मनना है की क्या पता इसी इनाम राशि से इनकी ज़िंदगी की आर्थिक तंगी दूर हो सके |ये अपना गांव का घर बना कर फिर अपना घर बसायंगे |
मेरी अपने page की माध्यम से भारत सरकार से ये निवेदन है की अगर आपको ओलंपिक्स स्तर की प्रतियोगिताएं में मेडल्स चाहिए तो अपने खिलाडियों की मेहनत को उचित सम्मान दे |
और आप सभी देशवासियों से भी यही सिफारिश है की असली हीरो ये होते है जो सालों साल अपना खून पसीना सिर्फ इसलिए बहाते है की तिरंगे का गौरव बढ़ा सकें …ऐसे ज़िंदादिल लोगों को आपका सिर्फ प्यार चाहिए होता है |
अपने जीवन संघर्ष में भी ऐसे ही लोगों को प्रेरणा बनाए ….यकीन मानिए आप कभी हार नहीं मानेंगे |
ये सब बातें तो मैंने आपको बताई उनके खेल जीवन की ..अब बताता हूँ मेरी शनिवार को हुई मुलाकात की कुछ दिल को छू लेनी वाली बातें | इस ज़िंदादिल इंसान का असली नाम है “वीरेंदर सिंह” लेकिन भारतीय कुश्ती की दुनिया में इन्हे “गूंगा पहलवान” (The Mute Warrior) के नाम से अधिक जाने जाते है | साल 2013 में इन पर आधारित एक डॉक्यूमेंटरी “गूंगा पहलवान” भी बन चुकी है |
आपको इनका नाम शुरू में इसलिए नहीं बताया क्यूंकि में ये देखने चाहता था की आप में से कितने लोग ऐसे थे जो मेरे नाम बताने से पहले इनके नाम को जान गए थे |
अब आपको इस ज़िंदादिल इंसान से हुई मेरी शनिवार की कुछ रोचक बातें बताता हूँ
1) मेरे इन से मिलने का समय सांय 4 बजकर 30 मिनट्स निर्धारित हुआ था और में किसी कारण वश 15 मिनट्स लेट हो गया ,वीरेंदर भाई दरवाजे के पीछे खड़े होकर कुण्डी पकडे मेरे इंतज़ार कर रहे थे | इंतज़ार की वजह दरसल ये थी की इनको अपनी ट्रेनिंग शुरू करनी थी | और मेरी वजह से वो लेट हो रहे थे |
2) जब मैंने भाई को उनकी तस्वीर छपी सेहत सिंह की टीशर्ट दी तो उनकी आँखों में जो ख़ुशी की चमक थी उस लम्हे को मैँ ज़िंदगीभर नहीं भूलूंगा |
3) भाई ने हमसे मिलकर तुरंत अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी ..वो लगभग 12 -14 छोटे-बड़े बच्चों को कुश्ती के दांव-पेंच सिखाते है | उनके सभी स्टूडेंट्स को देखर मुझे बड़ी खुशी हुई की और मन ही मन ये ख्याल भी आया की कितने खुसनसीब है ये बच्चे जो इन्हे इतना अच्छा गुरु मिला है | वो बहुत अच्छे से वीरेंदर भाई के इशारों को समझ रहे थे |आसपास का सारा माहौल शांत था लेकिन बाजुओं मैँ दौड़ता खून गरम |
अंकल अजित सिंह जी से आशीर्वाद लेकर उस अखाड़े से से निकल कर यही सोचता रहा की भगवान “मजबूत इरादे” हो तो इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता |
मैँ हमारे देश के खेल मंत्री माननीय श्री विजय गोयल जी से निवेदन करता हूँ, कृपया इस मूक योद्धा खिलाडी का संज्ञान ले और जो मदद सरकार द्वारा की जा सके करे |
आप भी उनसे जुड़ सकते है उनके पेज Virender Sing-Goonga Pehelwan

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