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शर्म करो दिल्लीवालों: Switzerland नागरिकों ने ठुकराए मुफ़्त भत्ते,बोले देश बढ़ाओ हमें मुफ़्त नहीं चाहिए बन जाएँगे आलसी और कामचोर

दुनिया

 

1975 में आई मशहूर फिल्म दीवार का एक यादगार डायलॉग है। जिसमें अमिताभ बच्चन डावर नाम के स्मगलर को कहते हैं कि वो आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाते हमारे देश में ये एक फिल्मी डायलॉग ही बनकर रह गया। लेकिन आज ये डायलॉग स्विटज़रलैंड के लोग दोहरा रहे हैं। स्विटज़रलैंड के लोगों ने एक ऐसा प्रस्ताव ठुकरा दिया है। जिसमें उन्हें हर महीने करीब 1 लाख 73 हजार रुपये मुफ्त में देने की बात कही गई थी। ये एक तरह से मुफ़्त का माल था लेकिन स्विटज़रलैंड के लोगों ने वोटिंग के ज़रिए पूरी दुनिया में ये संदेश दिया है कि वो सिर्फ काम के बदले में ही पैसा लेना पसंद करते हैं। इसलिए आज हमने स्विटज़रलैंड के लोगों की इस खुद्दारी का DNA टेस्ट किया।

स्विटज़रलैंड में सभी नागरिकों को सरकार की तरफ से Universal basic Income देने की योजना पर एक Referendum यानी जनमत संग्रह कराया गया। इस जनमत संग्रह के दौरान करीब 77 प्रतिशत लोगों ने योजना के विरोध में वोट किया जबकि योजना के पक्ष में सिर्फ 23 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया। योजना के तहत स्विटज़रलैंड में रहने वाले 18 वर्ष से ऊपर के हर नागरिक को 2500 Swiss francs यानी करीब 1 लाख 73 हज़ार रुपये हर महीने दिए जाने थे। जबकि योजना के अंतर्गत 18 साल से कम उम्र वालों को 625 Swiss francs यानी करीब 43 हज़ार रुपये दिए जाने जाने थे।

 

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इस योजना का समर्थन करने वालों का तर्क ये था कि स्विटज़रलैंड में लोगों की नौकरियां अब Robots और मशीने के हिस्से में जा रही हैं। इसलिए हर नागरिक को एक निश्चित Income मिलनी चाहिए। यानी एक तरह से स्विट्ज़रलैंड के लोगों को कमाई का मूल अधिकार दिया जा रहा था। 27 मई को DNA में हमने आपको बताया था कि कैसे दुनिया भर में Robots और Drones मिलकर  लोगों की नौकरियां ले रहे हैं और इसीलिए दुनिया के कई देश अब अपने नागरिकों को Basic Income देने की योजना बना रहे हैं। 

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ऐसा ही एक और देश FInland भी है। फिनलैंड में भी एक प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसके तहत 18 वर्ष से ज़्यादा की उम्र वाले फिनलैंड के हर नागरिक को 800 यूरो यानी करीब 60 हज़ार रुपये हर महीने दिए जाएंगे। अगर ये प्रस्ताव पास हो जाता है तो फिनलैंड अपने हर नागरिक को Fixed salary देने वाला पहला देश बन जाएगा। फिनलैंड की सरकार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 8 हज़ार लोगों के साथ इस प्रयोग की शुरुआत कर सकती है। लेकिन हो सकता है कि स्विटज़रलैंड के लोगों की तरह फिनलैंड के लोग भी इस प्रस्ताव को खारिज कर दें क्योंकि इन देशों के लोगों को लगता है कि इससे महंगाई बढ़ेगी, लोग आलसी हो जाएंगे और देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।

आप बहुत हैरानी के साथ ये सोच रहे होंगे कि दुनिया में ऐसे देश भी हैं जो अपने हर नागरिक को हर महीने एक निश्चित सैलरी देना चाहते हैं और इसके बावजूद वहां के नागरिक इस सुविधा से इनकार कर रहे हैं भला ऐसा कैसे हो सकता है? भारत के लोगों के लिए आश्चर्य का विषय इसलिए भी है क्योंकि यहां छोटे-छोटे लालच देकर भी लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं।

भारत में चुनावों के दौरान एक किलो चावल चीनी और थोड़ी सी शराब का लालच भी कई लोगों के ईमान पर भारी पड़ता है और वो अपना वोट उसी के नाम कर देते हैं जो उन्हें लालच देता है। भारत में लोग आरक्षण मांगने के लिए सड़कें जाम करते हैं तोड़फोड़ करते हैं इतना ही नहीं लोग बिना टिकट खरीदे ट्रेनों और बसों में यात्रा करना चाहते हैं। मुफ्त बिजली और मुफ्त पानी के लालच को आज भी भारत में लोगों को रिझाने के राजनीतिक हथियार के तौर पर देखा जाता है यानी अगर भारत में लोगों को Basic Income दी जाए तो हो सकता है कि भारत में बहुत सारे लोग काम करना ही छोड़ दें और यही लोग आगे चलकर राजनीतिक वोट बैंक में बदल जाएंगे। 
ज़ाहिर सी बात है कि जब काम में दिलचस्पी ना रखने वाले लोग अपना नेता चुनेंगे तो वो भी काम में दिलचस्पी नहीं दिखाएगा बल्कि FreeBies यानी प्रलोभन देकर बार-बार सत्ता पाना चाहेगा और ये किसी भी देश के लिए अच्छी बात नहीं है इसलिए आज हमने स्विटज़रलैंड के लोगों की खुद्दारी का DNA टेस्ट किया है जिसे भारत में मुफ्त सुविधाएं हासिल करने का सपना देखने वाले लोगों को जरूर देखना चाहिए।

स्विटज़रलैंड के लोगों ने हर महीने मिलने वाली जिस रकम को ठुकराया है वो भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय से भी ज्यादा है। भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 93 हज़ार 293 रुपये है यानी भारत में औसतन एक व्यक्ति को प्रति महीने करीब 7 हज़ार 777 रुपये ही मिल पाते है जबकि स्विटज़रलैंड में हर एक नागरिक को करीब 22 गुना ज्यादा रकम प्रति महीने मिलने जा रही थी।

भारत की इसी गरीबी का फायदा राजनीतिक पार्टियां उठाती हैं जो प्रलोभन देकर लोगों के वोट हासिल करना चाहती हैं या फिर सियासी लोकप्रियता बोटरना चाहती हैं। भारत के राज्य तमिलनाडु में एक दशक में राज्य सरकारों ने लोगों को colour television., लैपटॉप और घरेलू सामान देने का वादा करके 11 हज़ार 561 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद मुख्यमंत्री जयललिता ने डिप्लोमा और डिग्री रखने वाली हर शादी-शुदा महिला को मंगलसूत्र देने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। सरकार को इस योजना पर 1,607 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। तमिलनाडु में घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को 100 यूनिट तक बिजली मुफ्त देने का वादा किया गया है इस योजना पर सरकार 300 करोड़ रुपये खर्च करेगी।

यूपी सरकार भी छात्रों को लैपटॉप बांटने का वादा पूरा करने के चक्कर में 900 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, यूपी सरकार ने अब तक 80 हज़ार लैपटॉप बांटे हैं। आम लोगों को छोटी-छोटी सुविधाएं देकर बड़े-बड़े हित साधने वाली राजनीतिक पार्टियां आरक्षण की मांग को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती आई हैं। भारत में इस वक्त करीब 49.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है यानी सरकारी नौकरियों और हमारी शिक्षा व्यवस्था के बड़े हिस्से में आरक्षण अहम भूमिका निभाता है। 

आंकड़ों को मुताबिक भारत की 69.23 प्रतिशत जनसंख्या आरक्षण के दायरे में आती है। इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं लेकिन फिर भी आरक्षण का फायदा उठाना नहीं भूलते। आपने अक्सर देखा होगा कि आरक्षण की मांग करने वाले लोग, रेल की पटरियों पर धरना देने लगते हैं। ये प्रदर्शन जब उग्र हो जाते है तो सार्वजिनक संपत्ति को नुकसान भी पहुंचाया जाता है। 

भारत के संविधान में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए की गई थी, ताकि पिछड़े वर्ग के लोगों को आगे बढ़ने के मौके दिए जा सकें। और उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को बेहतर बनाया जा सके। भारत के संविधान का निर्माण करने वाले बाबा साहब भीम राव अंबेडकर भी चाहते थे कि आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ शुरुआती 10 वर्षों के लिए हो यानी भारत में आरक्षण की व्यवस्था को 1960 तक खत्म हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि राजनीतिक पार्टियों ने इसे चुनाव में जीत हासिल करने का हथियार बना लिया और वो हर चुनाव में इस हथियार को धार देना नहीं भूलती हैं।

ये इस बात का इशारा है कि भारत में Basic Income को ठुकराने वाली सोच को आने में, अभी काफी वक्त लग जाएगा क्योंकि फिलहाल सरकारों का ध्यान लोगों को बड़े फायदे देने की बजाय छोटे-छोटे प्रलोभन देकर वोट बटोरने का है। और लोग भी मुफ़्त का माल आते देखकर अपनी तिजोरियों के दरवाज़े पूरी तरह खोल देते हैं। भारत चाहकर भी अपने नागरिकों को Basic Income के तौर इतनी बड़ी रकम नहीं दे सकता क्योंकि भारत की जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। स्विट्ज़रलैंड की जनसंख्या सिर्फ 82 लाख है जबकि भारत की जनसंख्या करीब 128 करोड़ है।

 

वैसे भारत के 30 लाख करोड़ रुपये Black Money यानी काले धन के तौर पर विदेशों में जमा है। Ambit Research नाम की एक स्टडी में सामने आया है कि विदेशी बैंकों में जमा भारत का काला धन अर्जेंटिना और थाइलैंड की अर्थव्यवस्था के आकार से भी ज्यादा है। रिसर्च में दावा किया गया है कि 30 लाख करोड़ रुपये की ये रकम भारत के GDP के लगभग 20 प्रतिशत के हिस्से के बराबर है। 

हालांकि रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि भारत के काले धन में लगातार कमी आ रही है लेकिन ये अब भी कई देशों की अर्थव्यवस्था के बराबर है। कुल मिलाकर भारत का ये काला धन इतना ज्यादा है कि इस रकम से स्विटज़रलैंड के लोगों को करीब 17 महीनों तक Basic Income दी जा सकती है। 

कुल मिलाकर भारत भविष्य में ऐसी योजनाओं को अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना सकता है और हो सकता है कि ईमानदारी की लत भारत के लोगों को भी खुद्दार बना दें और और एक दिन भारत के लोग सरकार से सहायता और सब्सिडी लेने के बजाय समाज में अपना योगदान देने की इच्छा जताएं लेकिन इसके लिए भारत सरकार और भारत के आम नागरिकों को बहुत लंबे समय तक प्रयास करना होगा।

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